Friday, February 26, 2010

हिमाचल की जवानी का दर्दनाक पहलू

(28 दिसंबर 2009 को अमर उजाला में प्रकाशित)
युवकों की आत्महत्याएं चिंता का विषय है। पिछले सप्ताह करीब आधा दर्जन युवाओं ने खुदकुशी कर ली। हमने इसे कभी गंभीरता से लिया ही नहीं। यह एक बड़ी प्रशासनिक विफलता है।
हिमाचल में एक सप्ताह में आधा दर्जन आत्महत्याएं। यानी हर दिन एक खुदकुशी। मरने वाले सभी युवक। हताश क्यों है युवा वर्ग? निराशा की वजह क्या है? शायद हमने इस दिशा में सोचा ही नहीं। या यूं कहें चिंतन की जरूरत नहीं समझी। समय न होने का बहाना भी बना सकते हैं। मामला गंभीर है। परिस्थितियां जटिल हैं। यह नहीं कह सकते कि जान बुजदिल देते हैं। यह सोचकर भी पीछा नहीं छुड़ा सकते-जो मर गया उसे मरने दो। यह हमारी बहुत बड़ी प्रशासनिक विफलता है। बिलासपुर में 15 दिसंबर के दिन दोपहर को एक युवक ने कंदरौर पुल से छलांग लगा दी। जान इतनी आसानी से नहीं निकलती। गोविंदसागर में एक बार डूबने के बाद पानी ने उसे 'उगलाÓ। बचाव के लिए हाथ-पांव मारने लगा। पास खड़े लोगों ने उसे बाहर निकाला । कंदरौर के आयुर्वेदिक अस्पताल में उपचार के बाद यह कहकर घर भेज दिया कि अब हालत ठीक है। होनी को कुछ और ही मंजूर था। रात को घर में उसकी मौत हो गई। दो दिन बाद पालमपुर में दो युवकों ने जहर खाकर इस दुनिया को अलविदा कह दिया। अगले दिन ऐसा ही एक दर्दनाक हादसा कालका-शिमला रेलवे ट्रैक पर सोलन में हुआ। रेलवे ट्रैफिक पुलिस के मुताबिक एक नौजवान अचानक ट्रेन के सामने आ गया। इस बार मरने वाला युवक हरियाणा का था। हाल ही में शिमला में एक युवक ने असमय जान दे दी। मंडी में नौजवान ने तेजाब पीकर इहलीला समाप्त करने की कोशिश की। २२ दिसंबर को रिकांगपिओ में निरमंड के युवक ने फंदा लगा आत्महत्या कर ली। २४ दिसंबर को ठियोग में युवक कार में मृत मिला। बीते शनिवार पालमपुर में युवक ने जहर खाकर जान दे दी। इन्हीं मामलों से जुड़ी दस साल पुरानी दुखदायक घटना मन को जैसे व्यथित कर गई। धर्मशाला महाविद्यालय से १९९६ में गणित विषय के साथ एक होनहार युवक सुशील (काल्पनिक नाम) ने बीए पास की। सुशील शाहपुर के एक गांव का रहने वाला था। परिवार की हालत इतनी अच्छी नहीं थी। वह भीड़ से हटकर चलता था। बीए के बाद सुशील ने बीएड की। कंप्यूटर सीखा। एक दिन बहुत दुखद समाचार मिला। जैसे किसी को विश्वास ही नहीं हो रहा था। सुशील ने जहर खाकर खुदकुशी कर ली थी। इसकी वजह उसकी भविष्य को लेकर चिंता बताई गई। बहुत दुख हुआ। और कर भी क्या सकते थे। पिछले सप्ताह दक्षिणी दिल्ली के तिलकनगर से संयुक्त राष्ट्र से जुड़े एक नेपाली युवक का अपहरण कर लिया गया। अपहरणकर्ताओं ने पांच लाख की फिरौती मांगी। अपहृत युवक को नालागढ़ में छुड़ा लिया गया। इसमें सात आरोपियों में से पांच हिमाचल के निकले। उत्तरप्रदेश-बिहार में फिरौती मांगना आम बात हो सकती है। जम्मू कश्मीर में गोली चलना सामान्य बात हो सकती है, पर हिमाचली युवकों का अपहरण में शामिल होना बड़ी बात है।
युवाओं की हताशा के पीछे सबसे बड़ा कारण असुरक्षित भविष्य है। विधानसभा के शीतकालीन सत्र में उद्योग मंत्री किशन कपूर ने सदन को जानकारी दी कि ३१ अक्तूबर २००७ तक रोजगार कार्यालयों में पंजीकृत बेरोजगारों की संख्या ७,८०, ९७५ थी। दो साल में इसमें २,८९,०८६ का इजाफा हुआ। मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने सदस्यों को बताया कि जनवरी २००६ से लेकर जुलाई २००८ तक सरकारी/अर्धसरकारी/बोर्ड/निगमों में ४५,८४४ पद सृजित किए गए। १५ जुलाई २००९ तक इनमें से ३२,७४२ भरे जा चुकेहैं। उद्योग मंत्री के अनुसार हिमाचल में कुल १०,७०,०६१ बेरोजगार हैं। सरकारी रिकार्ड में ये बेरोजगार हैं। इसका मतलब यह नहीं कि ये कुछ नहीं कर रहे हैं। कोई दुकान चला रहा है, किसी ने टैक्सी रखी है, कोई निजी चालक-परिचालक है, किसी ने स्कूल खोला है तो कुछ बिजनेस भी कर रहे हैं। निजी कंपनियों ने भी रोजगार के द्वार खोले हैं। पर अकुशल कामगार को चार-पांच हजार से ज्यादा वेतन नहीं मिलता। चार-पांच हजार में क्या होता है। कुछ जिनकी चलती है, वे ठेकेदारी कर रहे हैं। आत्महत्या वे कर रहे हैं जिनके पास करने को कुछ नहीं है। जिसका बिजनेस फेल हो गया। जिसने कारोबार के लिए कर्ज लिया, पर सफल नहीं हो पाया।
हां, प्रेम प्रसंग भी आत्महत्या की एक छोटी सी वजह है। बेरोजगारों में युवतियां भी हैं। पर सदियों से परिवार चलाने की जिम्मेदारी पुरुष पर रही है। रोजगार पर लगी लड़की बेरोजगार से कभी घर नहीं बसाती। पुरुषों के मामले में उल्ट है। संतुलन कहां है। विषमताएं तो बढ़ेंगी ही। युवाओं का इस तरह से असमय काल का ग्रास बनना देश-प्रदेश केभविष्य के लिए अच्छा नहीं है। युवक की मौत पर मातम होता है। दस-बारह दिन शोक मनाकर सब भूल जाते हैं। और फिर एक आत्महत्या। पुलिस मामला दर्ज करती है। कुछ दिन बाद फाइल बंद हो जाती है। नीति निर्धारकों की जिम्मेदारी है कि इन मामलों को गंभीरता से लें। हर किसी को सरकारी नौकरी नहीं दी जा सकती। पर शैक्षणिक योग्यता के अनुसार बेरोजगारी भत्ता और पेंशन योजनाएं शुरू कर 'आसÓ जगाई जा सकती है। इन मामलों पर चिंतन के लिए समय निकालना होगा। अन्यथा कल के लिए बहुत देर हो जाएगी।

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