(अमर उजाला मेंं 29 जनवरी, 2010 को प्रकाशित)
हिमाचल में पूर्व सरकार की नियुक्तियों को अवैध ठहराने की जैसे रीत पड़ती जा रही है। इससे आम आदमी पीड़ा में है। क्या किसी की नौकरी छीनना मानवाधिकारों का उल्लंघन नहीं?
आज मेरी सरकार कल को आपकी। पांच साल हम लाल बत्ती वाली गाडिय़ों में घूमेंगे, उसके बाद आपकी बारी। ये हमारे कर्मचारी, वे आपके। ऐसी सोच ने व्यवस्थाएं जटिल कर दी हैं। मुश्किलें बढ़ी हैं। विसंगतियां जवानी पर हैं। स्वार्थ और पक्षपात हावी हैं। न्याय नहीं हो पा रहा है। क्योंकि हम निष्पक्ष नहीं हैं। वोटर दबाव में है। पीडि़त पक्ष किससे इंसाफ मांगे? दूरदर्शिता तो जैसे हमसे बहुत दूर हो गई लगती है।
शुरुआत पीटीए शिक्षकों से। अक्तूबर 2003 में पीटीए शिक्षकों की भर्ती के लिए अधिसूचना जारी हुई। शुरू-शुरू में शिक्षकों ने दो सौ-पांच सौ में सेवाएं दीं। कुछ मुफ्त में भी लगे। जून 2006 में वीरभद्र सरकार ने पीटीए के लिए सरकारी ग्रांट शुरू की। इसके बाद इस नौकरी के लिए भीड़ लगी। प्रदेश में पीटीए शिक्षकों की संख्या ६८०६ तक पहुंच गई। यहीं से ये शिक्षक राजनीति का केंद्र बने। आरोप है कि कांग्रेस सरकार ने 'अपने आदमीÓ लगाए। वर्तमान सरकार ने अप्रैल २००८ में इन भर्तियों की जांच का आदेश जारी किया। एसडीएम स्तर पर जांच शुरू हुई। प्रदेश में लगभग ३०८७ शिकायतें मिलीं। जांच को निजी रंजिश निकालने का भी जरिया बनाया गया। जिसका पड़ोसी से जमीन और पानी को लेकर विवाद था, उसने भी एसडीएम के नाम 'चिट्ठीÓ डाल दी। सितंबर २००८ में लगभग ९७७ पीटीए शिक्षकों की नियुक्ति को अवैध बताकर हटा दिया गया। पीडि़तों ने उपायुक्तों तथा कोर्ट से न्याय मांगा। दोबारा जांच में लगभग ५७१ शिक्षकों को बहाल किया गया। राजनीति पर फिर भी विराम नहीं लगा। पदोन्नति और तबादलों ने भी कइयों की नौकरी ली। अब तक करीब सवा दो सौ अध्यापकों को घर बैठाया जा चुका है। जो सेवारत हैं, हर समय चिंतित हैं। आज नौकरी है। कल का पता नहीं। स्कूल के गेट पर जब भी नया आदमी दिखता है। पीटीए शिक्षकों को यही डर होता है कि नियमित अध्यापक तो नहीं आ गया। ग्रांट मिलती है, वह भी घुट-घुट कर। सरकार को याद दिलानी पड़ती है। छह-छह माह बाद पैसे मिलते हैं। अठारह-२० साल किताबों में खपाने के बाद तीन-चार हजार में परिवार का पेट पाल रहे हैं। प्रदेश में कई स्कूल इनके सहारे हैं। फिर भी ये राजनीति का केंद्र हैं। अजीब विरोधाभास है। पीटीए की नौकरी लगने के बाद कई शिक्षकों ने इसी आस से शादी कर ली, भविष्य अच्छा है। आज सवा दो सौ बेरोजगार हो गए हैं। पति-पत्नी दोनों बिना काम के हैं। हाल ही में मंडी के निहरी स्कूल में पीटीए पर तीन साल से सेवारत टीजीटी मेडिकल को बाहर कर दिया गया। परिवार वाले किसे कोसें? कहां जाएं?
विडंबना है। सरकारी प्रतिनिधि बार-बार यही दावा कर रहे हैं कि ये सरकारी कर्मचारी नहीं हैं। पर इंसान तो हैं। इसी देश के नागरिक हैं। कम से कम 'घुंघरूÓ नहीं। यह नहीं बोल सकते कि सभी कांग्रेसी हैं। इसमें भी सच्चाई नहीं कि सभी की नियुक्तियां सिफारिश से हुईं। पीटीए शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष विवेक मेहता ठीक ही सवाल करते हैं। सरकारी पद पर २४० दिन लगाने के बाद उसे हटाया नहीं जाता, उन्होंने तो ५-६ साल लगा दिए हैं। वे अब कहां जाएं? पीटीए शिक्षक ही 'अछूतÓ क्यों? उन्हें ही अपवाद क्यों बनाया जा रहा है? उधर, बेरोजगार प्रशिक्षित संघ ने जाहू में बैठक कर चेतावनी दी है कि यदि मार्च तक पीटीए शिक्षकों को नहीं हटाया जाता तो वे प्रदेश भर में चक्का जाम शुरू करेंगे। लगा हुआ रोजगार छीनने की रीत मत डालिए। यह मत भूलिए कल को आप भी उसी पंक्ति में खड़े होंगे। कांग्रेस के नेता यह दावा कर रहे हैं कि उनकी सरकार बनते ही पीटीए शिक्षक बहाल होंगे। तो क्या तब तक वे बेकार बैठे रहेंगे?
इतना ही नहीं। कांग्रेस सरकार ने भी २००३ में पूर्व सरकार के नियुक्त किए गए स्नातक अध्यापकों को नौकरी पर नहीं रखा था। भाजपा ने छह साल बाद उनको राहत दी है। अनुबंध पर ६४ डेंटल डाक्टरों की नौकरी जाते-जाते बची है। उनका अनुबंध मार्च तक बढ़ा है। सरकार तर्क दे रही है कि वे नौकरी के लिए दोबारा से आवेदन करें। दुआ करें इनका अनुबंध सदा के लिए रिन्यू हो जाए। शिमला विश्वविद्यालय में भी ऐसे कई उदाहरण हैं। एक सरकार की नियुक्ति को दूसरी ने अवैध करार दिया। अभी प्रदेश के एक कालेज में चार लेक्चरर रातों-रात रखे गए। किसी को कानों-कान खबर नहीं हुई। इनमें कुछ तो वांछित शैक्षणिक योग्यता भी पूरी नहीं करते। शिक्षित वर्ग असमंजस में है। हर सरकार नए नियम बनाकर शिक्षक भर्ती कर रही है। प्रदेश में अध्यापकों की एक दर्जन से अधिक श्रेणियां हो गई हैं। एक जैसे शैक्षणिक कार्य के बावजूद भारी वेतन विसंगतियां हैं। ठोस शिक्षा नीति और भर्ती नीति का अभाव साफ दिखता है। घोर अस्थिरता है। हम किस परंपरा को जन्म दे रहे हैं?
क्या इस तरह नौकरी से हटाना मानवाधिकारों का उल्लंघन नहीं है? कर्मचारियों को ही घुंघरू क्यों बनाएं? नेताओं को कानून के दायरे में लाइए, जो ऐसी नियुक्तियां करवा रहे हैं। अधिकारियों के खिलाफ भी फाइल खोलिए। आम आदमी ही क्यों पिसे? पता नहीं हम किस जुबान से विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करते हैं? कहीं से आशा की किरण उदय होती नहीं दिखती। लेकिन फिर भी। उम्मीद रखिए। वह सुबह कभी तो आएगी।
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